सोमवार, अक्तूबर 16, 2017

यह विकट घेरा बंदी का काल है


आज कहीं अखबार की कटिंग पढ़ी कि अब सोशल मीडिया पर शेखी बघारना मँहगा पड़ेगा. अव्वल तो बात खुद से जुड़ी लगी अतः थोड़ी घबराहट स्वभाविक थी. शेखी तो क्या हम तो पूरे शेख बने फिरते हैं सोशल मीडिया पर. अपनी शेखी भी ऐसी वैसी नहीं, कभी खुद को गालिब तो कभी खुद को बुद्ध घोषित कर जाना तो आम सी बात है.
मगर तभी ख्याल आया कि इसमें महँगा पड़ने जैसी क्या बात है? फ्री है तभी तो सारे लोग जुटे पड़े हैं. प्रति शब्द १० पैसे भी लगा दे फेस बुक या व्हाट्स अप, तो गारंटी है कि ९५% फेसबुकिया कवि कविता लिखना छोड़ देंगे वे तो लिखते ही हैं इसलिए कि फ्री की जगह मिली है, कुछ २० शब्दों की धज्जियाँ उड़ाईं और उसे कविता कह कर छाप डाला. बकिया भी फ्री विचर रहे हैं. मित्र ने छापा है तो लाईक कर ही दिया जाये.
ये वो भीड़ है जिसे थूकदान देखकर ख्याल आता है कि चलो थूक लिया जाये.
फिर आज का माहौल देखकर एकाएक ख्याल आया कि कहीं सोशल मीडिया पर डाली पोस्ट पर भी तो जीएसटी नहीं लगा दिया. क्या भरोसा है इनका? कहते हैं जिस आदमी को चूहा पकड़ने का शौक लग जाये वो जब चूहेदानी लगाता है तब घर में छोटी से छोटी नाली का छेद भी खुला नहीं छोड़ता.
पूरा समाचार पढ़ा तो पता चला कि ये जो फेसबुकिये सबको चिढ़ाने के लिए पोस्ट लगाते हैं..फीलिंग कूल..फ्लाईंग फ्राम नई दिल्ली टू ज्यूरिख..स्विटजरलैण्ड इज कालिंग..जैसे इनमें ही भर सुरखाब के पंख लगे हैं जो इनको बुला रहा है स्विटरजरलैंड..हमें तो भोपाल भी काल नहीं करता. दूसरे चढ़ायेंगे..जस्ट चैक्ड ईन..पार्क हयात गोवा रिसार्ट एण्ड स्पा..टाईम टू रिलेक्स एण्ड हेव फन.ऐसे सारे स्टेटस को पकड कर उनके आयकर में दाखिल रिटर्न से मिलान किया जायेगा और टैक्स लगाया जायेगा. इस हेतु पूरा ठेका ६५० करोड़ में एल एण्ड टी इन्फोटेक को दे दिया गया है.
मने अब किसी को चिढ़ाने पर भी टैक्स. एक यही तो सुकून था कि चलो कहीं जा पाने लायक तो कमाई रह नहीं गई है व्यापार में- कम से कम फेसबुक और व्हाट्सएप से ही चिढ़ा लेंगे पडोसियों को..वो सुख भी जाता रहा.
इनकी स्कीमें देखकर तो लगता है कि जो शोचालय बना रहे हैं कहीं उसी के पीछे लैब में ये न टेस्ट कराने लगे कि बंदे ने कल क्या खाया था और उस पर जीएसटी भरा था कि नहीं.
यह विकट घेरा बंदी का काल है.
-समीर लाल समीर


पल पल इंडिया में प्रकाशित

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शनिवार, अक्तूबर 14, 2017

बारात में चलाये जाने वाले पटाखे क्यूँ नहीं नुकसान पहुँचाते?

मास्साब कक्षा चौथी के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. दीवाली असत्य पर सत्य की विजय का त्यौहार है. दीवाली पर खूब साफ सफाई कर दीपक जलाये जाते हैं. रोशनी की झालर लगा कर अंधेरे को भगाया जाता है. दीवाली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है. दीवाली पर लक्ष्मी गणेश की पूजा की  जाती है ताकि धन धान्य की कोई कमी न हो. दीवाली बहुत से व्यापारियों के हिसाब किताब का समय भी है. दीवाली पर मिठाई खाई जाती है. नये कपड़े पहने जाते हैं. पटाखे चलाये जाते हैं...
पटाखे क्यूँ चलाये जाते हैं? राजू पूछ रहा है.
क्यूँकि पटाखे चलाने से रोशनी होती है और धमाके की आवाज होती है जिससे डर कर बुरी बलायें आपके जीवन से भाग जाती हैं और पटाखे के धुँए से मच्छर मख्खी कीड़े मकोड़े आदि भी भाग जाते हैं और सिर्फ खुशहाली खुशहाली ही रह जाती है...मास्साब ने बताया.
तो क्या खुशहाली को पटाखों की आवाज और धुँए से डर नहीं लगता?
नहीं जैसे सत्य किसी से नहीं डरता वैसे ही खुशहाली भी किसी से नहीं डरती.
फिर दिल्ली में पटाखों पर बैन क्यूँ लगा दिया है? राजू ने जानना चाहा.
वो तो प्रदुषण के कारण लगाना पड़ा क्यूँकि दिल्ली में गाड़ियों और पड़ोसी राज्यों की तरफ खेतों के कचरे के जलाये जाने से आते धुँए से वैसे ही बहुत प्रदुषण है, इसलिए अगर उसी में पटाखे भी फोड़े जायेंगे तो प्रदुषण और बढ़ जायेगा. समझा करो..
मगर दीवाली तो एक ही दिन की है. बाकी जो धुँए साल भर होते हैं, उस पर क्यूं नहीं रोक लगाई जाती?
उसके उपाय भी खोजे जा रहे हैं. ऑड ईवन का फार्मुला भी लाया गया था मगर भाईचारे की कमी के कारण कामयाब न हो पाया. अब कुछ नया देखा जायेगा..वो तो सेन्सेशन का सियासी मामला है ..लगातार चलता रहेगा.
वैसे अगर धुँए से कीड़े मकोड़े और मच्छर मख्खी भाग जाते हैं तो फिर दिल्ली में इतने धुँएं के बाद भी डेंगू के मच्छर क्यूँ हैं? क्या यह भी खुशहाली की निशानी है? यह क्यूँ नहीं भागते?
वो बात अलग है..दीवाली पर एकाएक पटाखों से खूब सारा धुँआ और आवाजे हो जाती हैं इसलिए मना किया गया है...कह कर मास्साब ने टालने की कोशिश की.
राजू कलयुग के भी सबसे भीषण युग, इन्टरनेट एवं मीडिया युग का बच्चा है. वह अति जिज्ञासु है.
तब क्या यह शादी बारात, क्रिकेट मैच और चुनाव जीतने वाले जलूसों में भी बैन किया जायेगा?
नहीं नहीं,सिर्फ दिवाली के लिए है. क्रिकेट, शादी, नेतागिरी तो दिल्ली के प्रदुषण की तरह सदा होना है सब धर्म जाति के लोग उसमें शामिल रहते हैं.
राजू कन्फ्यूज है कि जो पटाखा दीवाली के दिन फूटने पर नुकसानदायी है वो नेता के चुनाव, क्रिकेट  जीतने पर या शादी की बारात में क्यूँ नहीं नुकसान पहुँचाता?
अगर मास्साब उसे दीवाली की सफाई से जोड़ कर समझाते तो शायद वो फिर भी समझ जाता.चाहते तो भारत के स्वच्छता अभियान से जोड़ कर भी बात कर सकते थे कि पटाखों से गंदगी फैलती है, कूड़ा मचता है जो दीवाली के मेन्डेट के खिलाफ है. शायद कोई सरकारी अवार्ड भी पा जाते मास्साब ऐसे समर्थन पर.
वैसे राजू अब गहराई से सोच रहा है दीवाली और चुनाव जीतने वाले जलूस के बारे में तो उसे लग रहा है वाकई अन्य शहरों से चुनाव जीत कर पटाखों की आवाज और धुँए से शहर छोड़ आई बलायें  जो दिल्ली की संसद में विराजमान है और उन पटाखों के धुँए से शहर छोड़ कर दिल्ली में आ ठहरे भक्त रुपी मच्छर मख्खी ..उनके बारे में सोचना भी जरुरी है.
ऐसे में अगर दिल्ली में भी पटाखे छोड़े जाने लगे तो यह कहाँ जायेंगे?
बलाओं और मच्छर मक्खियों को भी तो रहने के लिए कोई न कोई ठिकाना चाहिये.
शायद दिल्ली में पटाखों पर बैन ही एक मात्र उपाय है!!
-समीर लाल समीर
भोपाल के सुबह सवेरे में  अक्टूबर १५, २०१७ को प्रकाशित:

http://epaper.subahsavere.news/c/22931075

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रविवार, अक्तूबर 08, 2017

टीआरपी (TRP) के बदले आरआईपी (RIP)

अगर कोई सुन्दर बाला आपसे कहे कि वो २०-२० के क्रिकेट मैच में हिस्सा लेकर लौट रही है, तो सीधा दिमाग में कौंधता है कि चीयर बाला होगी. किसी के दिमाग में यह नहीं आता कि हो सकता है वो महिला लीग का २०-२० खेल कर लौट रही हो. वही हाल हमारा होता है जब शाम को हमारे घर लौटते हुए रास्ते में कोई मिल जाये और उसे हम बतायें कि जिम से लौट रहे हैं. सब समझते हैं कि जिम का ऑडिट करके आ रहे होंगे या जिम में एकाऊन्टेन्ट होंगे. सी ए होने के यह लोचे तो हैं ही. कोई यह सोच ही नहीं पाता कि बंदा कसरत करके लौट रहा है. कई मारवाड़ी मित्र सोचते हैं कि बोलने में मात्रा गलत लगा दी होगी तो पूछते हैं कि कहाँ से जीम के लौट रहे हो? उनको लगता है कि किसी दावत से जीम (खा) कर लौट रहे हैं.
अतः हमने भी अब यह सोच कर बताना ही बंद कर दिया है कि बाद में तब बतायेंगे जब करनी और कथनी एक सी दिखने लगेगी. वरना हमारी हालत भी सरकार वाली हो जायेगी कि जो कुछ भी करेगी, यही कहेगी कि भ्रष्टाचार मिटा रहे हैं और मिटता विटता कुछ नहींहालांकि हम वजन के जिस मुकाम से लौट कर आज जिस मुकाम पर खड़े हैं, इस मुकाम तक आने के भी पहले ही जो बंदे लौट लिए वो देश भर में फिटनेस गुरु से बने फिटनेस के मंत्र बांटते नहीं थक रहे. ऐसा मानो कि कोई एवरेस्ट के बेस कैम्प नेपाल तक जाकर लौट आया हो दिल्ली वापस और देश भर को पर्वतारोहण के तरीके और गुर सिखा रहा हो और मीडिया उसके इर्द गिर्द लट्टू सी नाच रही हो. एक हम हैं कि एवरेस्ट पर झंडा गाड़ कर अभी वापस उतर ही रहे हैं और किसी को दिल्ली में कानों कान खबर तक नहीं है.
मीडिया भी एवरेस्ट पर चढ़कर कवरेज लेने से तो रही और सनसनीखेज की तलाश भी अनवरत बनी हुई है तो ऐसे ही लोग बच रहते हैं जो बेस कैम्प से लौट कर पर्वतारोहण के नुस्खे बांट रहे हों और पत्रकार उनसे पूछ रहे हों कि आप युवाओं को पर्वतारोहण के लिए क्या टिप देना चाहेंगे? और टिप के नाम पर बंदे गुरु मंत्रों का उच्चारण शुरु कर देते हैं.
वक्त वक्त की बात है. एक दिन हम भी एवरेस्ट से उतर कर जब दिल्ली पहुँचेंगे तो तहलका मचायेंगे, ऐसा विचार है मगर तब तक मीडिया ऐसे छद्म पर्वतारोहियों से इन्टरव्यू ले लेकर पर्वतारोहण का ही क्रेज  खत्म कर डालेगी तो हमारी सुनेगा कौन?
ये वैसे ही है जैसे कि बच्चे आज भी बोरवेल में गिरते हैं मगर कोई खबर नहीं लेता. सब मीडिया की अति का कमाल है. एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब मर्डर, रेप, रेल दुर्घटानायें, भ्रष्टाचार, बाबों का सियासत के मिल कर रचा जा रहा सामराज्य एवं तांडव, सिस्टम की कार गुजारियाँ आदि सब बच्चे के बोरवेल में गिरने जैसा ही बिना कान पाया हादसा बन कर रह जायेगा.
सजग होना होगा मीडिया को कि दिल्ली की गोदी से उतर कर हिमालय की वादी तक पहुँचे पर्वतारोहण की खबर जुटाने के लिए. खबर की तह तक जाये. खबर सुनाने पर ध्यान लगाये बजाय खबर बनाने के..उसे फरक करना होगा खबर और सनसनीखेज चमकदार वारदात के बीच...वरना शायद एक रोज टीआरपी (TRP) देने वाले ही न मूँह मोड़ कर आरआईपी (RIP) देने लग जायें....तब हाथ मलने के सिवाय कुछ न बच रहेगा..
याद रहे सोशल मीडिया नित जिम जा जा कर मजबूत हुआ जा रहा है.
-समीर लाल समीर
भोपाल के सुबह सवेरे में आज सोमवार अक्टूबर ९, २०१७ प्रकाशित:

http://epaper.subahsavere.news/c/22756350

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शनिवार, अक्तूबर 07, 2017

राष्ट्रप्रेम है तो महसूस करो विकास को

हर चीज़ जो होती है वो दिखे भी- ऐसा तो कतई ज़रूरी नहीं है. आप ही देखें कि हवा होती तो है लेकिन दिखती कहाँ है? खुशबू होती तो है मगर दिखती कहाँ है? मोहब्बत होती तो है मगर दिखती कहाँ है? यह सब बस अहसास करने की, महसूस करने की बातें हैं.
संभव है कि एक स्थान पर खड़े सभी लोग हवा एक साथ अहसास लें मगर देख तो कोई भी नहीं पायेगा. ऐसा भी संभव है कि एक ही दायरे में खड़े सभी लोगों को फिज़ा में खुशबू का अहसास हो मगर उन्हीं में से कोई एक, जिसे तगड़ा जुकाम हुआ हो वो नाकबंदी के चलते खुशबू न अहसास पाये या फिर उन्हीं में से कोई एक जो महीनों से नहाया न हो, जिसे स्वच्छता का तनिक भी अंदाजा न हो, जिसके पास स्वच्छ भारत की, स्वच्छ भारत अभियान के पहले और बाद में, पहले वाले की तस्वीर के लिए मॉडल बनने की सारी योग्यतायें हैं, उसके आस पास खड़े लोग उस बंदे की दुर्गन्ध से ऐसा परेशान हों कि खुशबू अहसास ही न पायें तो इसमें खुशबू की तो कोई खता नहीं है. स्वभावतः गन्दगी सदा सफाई पर और दुर्गन्ध हमेशा सुगन्ध पर हाबी हो जाती है. फिर यह मानसिक ही क्यूं न हो.
मोहब्बत तो भरी भीड़ में भी उसे करने वाले प्राणी ही आपस में अहसास पाते हैं, भले बाकी की सारी भीड़ अपनी अपनी परेशानियों और नफरतों में उलझी हो.
इन सब बातों का कोई लॉजिक नहीं होता.लाख साधु संत माईक पर चीख चीख कर कहते रहें कि आपस में प्यार करो, नफरत छोड़ों. मगर जिसे प्यार है वही प्यार करेगा. जिसे नफरत है वो नफरत ही करेगा. बाबाओं और साधु संतो की बात भी तब ही समझ आती है जब सच्चे मन से भक्ति करो.वरना तो अगर भरोसा न हो तो डॉक्टर की दवा भी काम न करे. अच्छा और सच्चा भक्त बाबा की बताई राह पर आँख बंद करके चलता है फिर भले ही वो राह गुफा की तरफ जाती हो. कई बार कई बाबा तो प्यार सिखाते सिखाते अति उत्साह में थ्योरी से आगे प्रक्टिकल की क्लास भी लगा डालते हैं और फिर जेल में संतई की सजा काट रहे होते हैं.
ऐसे ही अहसास आज की नई दुनिया में विकास और मंदी हैं. सच्चा और पूर्ण समर्पित भक्त ही इस अहसास को महसूस कर रहा है कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो गई है और विकास पुरजोर गति से विकसित होता जा रहा है. वह मन से अहसास करता है और मन की बात सुनता है. उसके कान में बस बाबा के स्वर गुँजते हैं मितरों, अर्थव्यवस्था एकदम तेज गति से मजबूत से भी मजबूत हुई जा रही है और विकास एकदम बुलेट ट्रेन की गति से हुआ चला जा रहा है. कुछ लोगों को देश में निराशाजनक बातें फैलाने में खूब मजा आता है....दुख की बात तो यह है कि सारे आंकड़े भी उन्हीं लोगों के साथ जा मिले हैं. मैं ऐसे आंकड़ों को नहीं मानता. मैं तो विकास को विकसित और अर्थव्यवस्था को मजबूत होते नित अहसास रहा हूँ..आप भी अहसास कर रहे हो कि नहीं?  सभी भक्त सम्वेत स्वर में हुंकारा लगाते हुए हामी भर कर उन लोगों को राष्ट्रद्रोही करार करने में जुट चुके हैं जिनको न तो कहीं विकास दिख रहा है और न ही अर्थव्यवस्था में मजबूती.
अगर आपके दिल में राष्ट्रप्रेम है तो अहसासो विकास के विकास को, महसूस करो अर्थव्यवस्था की मजबूती को..वरना नये लिटमस टेस्ट के हिसाब से आप राष्ट्रद्रोही ठहराये जा सकते हैं.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर ८, २०१७ के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/22734675

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गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

ऊँचे साहित्यकार


वह एकाएक एकदम मौन और गंभीर हो गये थे. डिप्रेशन का शिकार आम आदमी और स्वयं को बुद्धिजीवी मान बैठा साहित्यकार लगभग ऐसे ही मौन और गंभीर हो जाता है. डिप्रेशन का शिकार आम आदमी यह सोचकर मौन हो जाता है कि वो बोलेगा तो कोई सुनेगा नहीं और स्वयं को बुद्धिजीवी मान बैठा साहित्यकार इसलिये नहीं बोलता कि कहीं उसकी मूर्खता जगजाहिर न हो जाये. ऐसा साहित्यकार बोलने और मुस्कराने के लिए साहित्यिक विचार विमर्श में उस क्षण का इन्तजार करता है जब वो अपने सीमित अध्ययन के आधार पर किसी विदेशी साहित्यकार को कोट करते हुए उसी साहित्यकार की बात को विमर्श में अपनी तरफ से जोड़ दे, लोग वाह वाही करें और पुन: मौन धारण कर गंभीर हो जाये.गंभीर होने के पूर्व उसके चेहरे पर एक क्षणिक कुटिल मुस्कान उभरती है जिसे देखकर लगता है कि वो अपने सामने सबको मूर्ख समझता है मगर असलियत में वह अपनी मूर्खता छिपा रहा होता है.
हुआ यूँ कि किसी ने उनसे पान की दुकान पर फ्री का पान खाने की चाह में यह कह दिया था कि आजकल आप अखबार में खूब छप रहे हैं. हालांकि उनके कुल जमा तीन ही आलेख अखबार में छपे थे, लेकिन १ से ज्यादा को खूब सारा पुकार कर अपना काम सधवा लेने वालों के लिए काफी था अतः उसने कहा कि आपका लेखन एक प्रकार से समाज की सेवा है. यह समाज की सोच को एक नई दिशा देता है. दरअसल आप जिस तरह विसंगतियों पर अपनी कलम से प्रहार करते हैं उससे समाज सुधार की अलख जागती है..आपकी कलम और कागज मानो कि दो चकमक पत्थरों को किसी ने घिस दिया हो और एक चिंगारी उठी हो जिससे समाज सुधार रुपी सुतली ने आग पकड़ ली हो और वो देखिये सब लोग उससे अपनी सिगरेट सुलगा रहे हैं. उसने पान की दुकान पर सिगरेट जलाने के लिए सुलगती हुई सुतली की तरफ इशारा किया.
वैसे यह अलग बात है कि सिगरेट सुलगा कर निकल गये लोग न जाने किस विचार में खोये सिगरेट के धुऐं से छल्ले बना कर उड़ा रहे हैं..उनकी अपनी समस्यायें हैं..देश की अपनी..
इन समस्याओं से इतर उस पान की दुकान पर खड़े इस महान समीक्षक की समस्या फ्री में पान खाने का जुगाड़ करना था अतः उसने इसके आगे अपना बयान जारी रखा.. भाई साहब, आप अपने इधर उधर फैले अखबारों मे छपे तमाम आलेखों को पुस्तकारुप देकर एक जगह संकलित कर समाज के लिए संरक्षित करें ताकि आने वाली पुश्तें यह समझ पायें कि समाज में आये बदलावों के प्रणेता कौन थे..आपके सशक्त लेखन और प्रगतिशील विचारों को पीढ़ियां याद रखेंगी.
खैर भावविभोर होकर उस समीक्षक को पान खिला कर विदा किया और बस!! यही वो क्षण था कि वह मौन हो गये और भरी गरमी में गंभीरता की रजाई ओढ़े घूमने लगे.
उन्हें पता था कि बड़ा सहित्यकार वह होता है जो कुछ कहता नहीं..बस मौन और गंभीर रहता है..और बहुत बड़ा साहित्यकार वह होता है जो कुछ लिखता नहीं...उसकी कलम मौन रहती है..और वह मुखर.. बस एक ही तड़प हर मंच पर घूम घूम कर उजागर करता रहता है कि आजकल साहित्य में कोई स्तरीय नहीं लिख रहा है. वह हर वक्त यहीं चिन्ता जाहिर करता अपने संपर्क क्षेत्र को विस्तार देता चला जाता है.
देखते देखते बहुत बड़ा सहित्यकार बनने की चाह में उन्होंने लिखना बंद कर दिया..और मंचो से आजकल अच्छा साहित्य न रचे जाने पर चिन्ता जाहिर करते करते अपने बढ़ते संपर्क सूत्रों के चलते चाहने वालों का हुजूम भी इक्कठा कर लिया. अब तो अनेकों शिष्यायों और शिष्यों से घिरे रहना ही उनकी दिनचर्या है.
कल किसी ने बाताया कि कुछ बच्चियाँ उन पर रिसर्च करने का विचार बना रही हैं. मन आता है उन बच्चियों से पूछने का कि रिसर्च करने के पहले उनका लिखा तो सर्च तो कर लो फिर शायद रिसर्च करने की आवश्यकता न पड़े. मगर नदी में रहकर मगर से बैर कौन मोल ले, इसलिए मैं भी मौन रहा.
इतिहास गवाह है कि बहुतेरे महापुरुष तो महापुरुष हुए ही इसलिए क्यूँकि किसी ने उनके आभामंडल से उठते प्रकाशपूंज से चौंधिया कर खोज करने की बजाय उन पर शोध करने की ठान ली थी.
-समीर लाल समीर’  
पल पल इंडिया अखबार में तारीख ५ अक्टूबर २०१७ को:

http://palpalindia.com/2017/10/04/kla-sanskriti-Sameer-Lal-Litterateur-Buddhist-news-in-hindi-212651.html

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