शनिवार, दिसंबर 16, 2017

छेड़छाड़ का जीवनकाल: चलता है से मानहानि तक

छेड़छाड़ का इतिहास तो बहुत पुराना है. हमारे समय में कोई मोहल्ला, कोई शहर और कोई प्रदेश इसके लिए कुख्यात हुआ करते थे. लेकिन कुख्यात होना अपनी जगह था और कहीं ज्यादा कहीं कम की मात्रा में लड़कियों से छेड़छाड़ आम बात थी. जैसे कभी कुख्यात चंबल में पाये जाते थे तो फिर संसद में पाये जाने लगे. मगर उनके लिए विधानसभा से लेकर ग्राम पंचायत तक एकमोडेशन हर श्रेणी में उपलब्ध तो थी ही. ऐसे में लड़कियों को बचपन से समझाया जाता था कि सर झुका कर चलो. किसी अनजान लड़के की तरफ आँख ऊठा कर मत देखो. दुप्पट्टे के बिना मत निकलो और न जाने क्या क्या? लड़को के लिए कोई सीख नहीं दी जाती थी घरों में. मानो चोर पकड़ने की बजाय चोरी की रपट लिखवाने आये पीड़ित की थाने में क्लास ली जा रही हो कि घर में कैश और जेवर मत रखो. घर में हर वक्त कोई न कोई रहे, कभी ताला लगाकर घर अकेला मत छोड़ो. जब तक इनकी क्लास चल रही है तब तक वही चोर किसी और के घर में हाथ साफ करके इन्हीं थानेदार मास्साब से हिस्सा बाँट करने की तैयारी कर रहा होता है.
फब्ती, सीटीबाजी, आँख मार देना, बाजू से स्कूटर या साईकिल से लड़की को छूते हुए निकल जाना तो एकदम न के बराबर छेड़खानी माना जाता था. मानो पटवारी या कोई बाबू काम करने के १००/५० रुपये मांग रहा हो तो इसमें शिकायत क्या करना? इससे ज्यादा तो शिकायत लिखवाने और उस पर कार्यवाही करवाने में खर्च हो जायेंगे और काम न होगा सो अलग. समाज यह मान कर चलता था कि लड़कियाँ सड़क पर निकली हैं तो मनचले किस्म के लड़के इतना कुछ तो करेंगे ही. लड़कियों को भी लालन पालन के दौरान ऐसी मानसिकता पनपा दी जाती थी कि वो भी इसे सामान्य सी घटना मान कर एक हल्की सी घुटन के साथ मौन सह जाती थीं. घर आकर बतायें भी तो क्या?
हाँ, जब छेड़छाड़ का स्तर इतना बढ़ जाता था कि लड़का रास्ता रोकने लगे, जोर जबदस्ती करने लगे, बात सहनशीलता की सीमा पार करने लगे तब जाकर लड़कियाँ किसी तरह अम्मा को आकर या घर में बड़ा भाई हो तो उसे बताया करती थीं. भाई या पिता जी दमदार रहे तो लड़के को पकड़ कर बुलावाया जाता था. पिटाई की जाती थी और लड़की से उसको राखी बँधवा कर उससे लड़की के पैर छुलवाये जाते थे और इस वादे के साथ छोड़ा जाता था कि अगर इसके आस पास भी नजर आये तो हाथ पैर तुड़वा देंगेऔर अगर पिता और भाई दमदार न रहे तो अगले दिन से भाई की ड्यूटी लग जाती थी कि उसे कालेज तक छोड़ कर आये और शाम को लिवाता आये. पुलिस में इस तरह की छेड़खानी की रिपोर्ट लिखवाने का न तो रिवाज था और न वे लिखा करते थे. पुलिस के पास ज्यादा कमाई वाले कामों से इतनी फुरसत ही कहाँ होती थी कि छेड़छाड़ रोकने जैसी समाज सेवा करे?
एकाएक कभी शहर की पुलिस अपने आपको मुस्तैद दिखाने के लिए, चुनाव में अपनी ताकत दिखाने के लिए रोड़ शो और रैली निकालने टाईप के अंदाज में, मजनू पकड़ अभियान चला दिया करती थी. लड़कियों के कालेज और स्कूल के आसपास से निकलते लड़को को बिना जाने परखे पकड़ पकड़ पुलिस मारा करती, कभी लम्बे बाल वाले लड़कों के बाल बीच से काट देती, तो कभी लम्बे चौड़े बेलबोटम का बेल काट देती. दो तीन दिन मुस्तैदी से अभियान चलता. धरपकड़ की तमाम तस्वीरों के साथ अखबार इस अभियान की खबर से पट जाते. शहर मान लेता कि सब सेफ है इस शहर में. अभियान खत्म हो जाता और फिर ढाक के वही तीन पात. मानो चुनाव जीत लिया है, अब काहे का रोड़ शो और काहे की रैली. अगले चुनाव के पहले फिर दिखा देंगे अपनी ताकत एक बार और.
तब छेड़छाड़ को सभी छेड़छाड़ पुकारते थे और इसका अधिकतम जीवनकाल छेड़छाड़ से शुरु होकर सहन कर जाने से आगे जाकर लड़के की पिटाई या भाई के संग कालेज आने जाने पर आकर मुश्किल से दो चार दस दिन में समाप्त हो लेता था..फिर कोई नई छेड़छाड़, नया मनचला आ जाये तो अलग बात..मगर कोई इसे दिल से लगाये जीवन नहीं गुजार देता था.
आजकल की तो हर बात निराली. गरीब मजदूर साईकिल से २५ किमी चलाकर काम पर रोटी कमाने जाये तो बेचारा गरीब मजदूर और रईस दो रोटी खाकर उसे पचाने के एक ही जगह खड़े खड़े ५ किमी साईकिल चलाये तो वाह!! वर्क आऊट..कार्डियो..और फिटनेस फ्रीक...काम एक ही..नजरिया अलग अलग.
वही हाल छेड़छाड़ का हो लिया है. गरीब की बेटी से हो तो छेड़छाड़..इसका क्या नोटिस लेना. ये तो हमेशा से होता आया है. मगर रईसों के बीच हुआ तो सेक्सुअल हैरासमेन्ट, मुकदमा और कम्पन्शेशन. मानो छेड़छाड़ न हो मानहानि हो गई हो..गरीब मजदूर का तो कोई मान है ही नहीं..तो पब्लिक में लतिया भी दो तो हानि कैसी? मगर वही किसी नेता, किसी नेता के बेटे बेटी, किसी दमदार व्यवसायी के खिलाफ सच भी बोल दो तो ५ करोड़ से तो मिनिमम मानहानि का मुकदमा शुरु होता है..इससे नीचे का दायर करेंगे तो खुद की ही मानहानि करा बैठेंगे समाज में आजकल..लोग कहेंगे बस्स!! इत्ती सी कीमत मानहानि की? मान की कीमत स्टेटस सिंबल है भले ही करमों और कारनामों की तराजू में तौलो तो कौड़ी भर की कीमत न निकले.
सेक्सुअल हैरासमेन्ट महज हवाई जहाज में पैर टकरा जाने से लेकर कँधे पर हाथ रख देने तक से हो सकता है और उसके आगे के करम तो वाकई सेक्सुल हैरासमेन्ट की श्रेणी में हैं मगर कब और कैसे, यह दीगर विषय है. इस हेतु हैरासमेन्ट का मुआवजा मांगने की भी कोई एक्सपायरी नहीं है. जितना बड़ा छेड़ने वाले का नाम, उतना बड़ा छिड़ जाने वाली के मुआवजे का दाम. सन १९८२ से १९८७ तक ये मुझे छेड़ते रहे, का दावा सन २०१७ में ३० साल बाद? फिर एक के दावे के पीछे पीछे १० और लड़कियों का दावा..मानो कोई जेबकतरा स्टेशन पर पकड़ा गया हो और लोग मिलकर उसे अपनी पांच साल पहले कटी जेब को याद करके लतिया रहे हों..मारो मारो.. वैसे ही सेक्सुअल हरासमेन्ट का एक मुकदमा दर्ज होते ही..कितने सारे और लोग निकल कर आ जाते है कि हाँ हाँ, इसने मुझे भी छेड़ा था १९९२-९४ के टाईम फ्रेम में, जब मैं किचन में पानी लेने गई थी और इसने मुझे पीछे से आकर मेरे कँधे पर थपथपा कर पानी मांग लिया था. पूछा गया कि आपने उस समय ३० साल पहले इसकी शिकायत दर्ज क्यूँ न कराई तो एक बोली कि उस समय मुझे समझ ही न आया कि ये छेड़छाड़ है. उस समय तो इसी की बदौलत इन्होंने अपनी फिल्म में मुझे काम दिया तो कमाई हो रही थी. अब जब उम्र गुजरी तो कमाई रुकी तो सोचने को समय मिला ओह!! इसने तो मुझे छेड़ा था और कमाई का अब जरिया भी क्या है. मानो जिन्दगी भर दो नम्बरी काम करते रहे और जब बुढ़ापा आया तो साधु बनकर ज्ञान बांटने लगे कि दो नम्बर के काम करना बुरी बात है. दूसरी कह रही है कि वो पहली वाली ने जब मुकदमा दायर किया तब मैने दिमाग पर जोर डाला तो मुझे भी इसकी छेड़छाड़ याद आई तो मैने भी मुकदमा दायर कर दिया. तीसरी कहती है कि मैने तो इस मुकदमे को देख कर जाना कि इसे छेड़छाड़ कहते हैं तो मैने भी लगा दिया.
ऐसा नहीं कि मैं सेक्सुअल हैरासमेन्ट का विरोध नहीं करता और ऐसा भी नहीं कि लड़कियों के द्वारा इस तरह के हैरासमेन्ट के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत को मैं सलाम नहीं करता मगर एकाएक इस तरह से जब इतने पुराने पुराने वाकिये एक ही व्यक्ति के खिलाफ एक ही समय में निकलते हैं और फिर चेन रिएक्शन की तरह दूसरे नामी के खिलाफ..फिर तीसरे के खिलाफ..मानो एक दौर आ गया हो जब हर सेलीब्रेटी और नामी पैसे वाला इसकी चपेट में आये जा रहा हो..तब सोचना मजबूरी हो जाती है.
कभी कभी तो ऐसे मुकदमे डरा देते हैं कि कहीं कभी हम सेलीब्रेटी या बड़े वाले देश के सेनेटर वगैरह हो लिए तो स्कूल के समय की कोई बाल सखी आकर मुकदमा न दायर कर दे कि टीप रेस (आईस पाईस) खेलते समय ये मेरे साथ एक ही पेड़ की ओट में आकर छिप लिये थे..और फिर बाकी की बाल सखियाँ आयें और मुकदमा लगायें कि मेरे साथ चट्टान की पीछे छिपे थे तो कोई इस बात का ही मुकदमा लगा जाये कि सबको छेड़ा और हम छिड़ने को तैयार थे तो भी न छेड़ा..मुझे इग्नोर करके मुझे हीन भावना से ग्रसित करने के लिए इन पर ५ करोड़ का मुकदमा..
नया जमाना नई सोच. कौन जाने कब कौन किस छेड़छाड़ में धरा जाये..  
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के दिसम्बर १८, २०१७ के अंक में प्रकाशित:
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शनिवार, दिसंबर 09, 2017

मेहमान दो प्रकार के होते हैं

यूँ तो मेहमान दो प्रकार के होते हैं- एक तो वो जिन्हें हम बुलाते हैं और दूसरे वो जो बिन बुलाये चले आते हैं.
बिन बुलाये मेहमान किसे पसंद आते हैं भला और उनके कारण हुई परेशानी और फजीहत के किस्से तो जग जाहिर हैं ही, अतः यहाँ हम उनकी बात नहीं करेंगे. बिना बुलाये आई अनेको अनेक परेशानियाँ यूँ भी क्या कम हैं जो इनकी बात करें? परेशानियों की बात करना होती तो नोटबंदी की करते, जीएसटी की करते, ईवीएम की करते..लिस्ट इत्ती बड़ी दिखी कि चुप मार गये हैं परेशानियों पर..
अतः बात करते हैं बुलाये हुए मेहमानों की. बुलाये हुये मेहमान दो प्रकार के होते हैं एक जो विदेश से आते हैं और दूसरे देशी.
देशी तो हम खुद भी हैं और हमारा डीएनए कहता है कि कम से कम देशियों में तो हम ही बेस्ट हैं. यह अहम का भाव हर देशी में है. तो जब मेहमान देशी हो तो हमसे बेहतर तो होने से रहा इसलिये उसे क्या तव्वजो दी जाये? हमारे यहाँ तो मेहमान क्या, रेल भी जब तक विदेश से न मंगवा लें, तेज भाग ही नहीं सकती. विदेशी दौरा करके और विदेशियों से सलाह लेकर किया गया काम अव्वल ...जबकि वही विदेश हमारे देशी टेलेंट को बुला बुला कर धन्य हुआ जा रहा है. देश से निकला सुन्दर पिचाई या सत्या नडेला जब अमरीका में गुगल और माइक्रो सॉफ्ट का हेड हो जाता है तो सारा देश गौरवांवित होता है कि देखो, हम जगत गुरु बनने की राह पर हैं...प्रधान मंत्री उन्हें गले लगाता है मगर विडंबना देखिये कि देश में ही न जाने कितने सुन्दर और सत्या पड़े हैं जिन्हें पहचानने को देश में कोई तैयार ही नहीं और मजबूरीवश उन्हें अपनी पहचान जाहिर करने के लिए अमरीका और कनाडा जैसे देशों में पलायन करना पड़ता है. कनाडा लिखकर व्यंग्यकार खुद को गौरवांन्वित होने का अहसास दिलाना चाहता है. मेक ईन इंडिया के लिए भी आह्वाहन विदेशियों से ही किया जा रहा है.. अतः विदेशी बेहतर देशी से..यह तय पाया...तो देशी मेहमान कि बात क्या करना..उसे छोड़ते हैं इसी मोड़ पर. अलविदा देशी मेहमान ...
अब बात करते हैं विदेशी मेहमानों की. विदेशी मेहमान दो प्रकार के होते हैं- एक जिन्हें पैसा रुपया देकर बुलाया जाता है और दूसरे जो यूँ ही निमंत्रण पर चले आते हैं.
जिन्हें पैसा रुपया देकर बुलाया जाता है उसमें सलाहकार से लेकर जस्टीन बीवर टाईप वन नाईट फीवर तक के लोग शामिल हैं...वे सब व्यवसायिक कारणों के ध्योतक हैं. इन्हें मेहमान कहना भी उतना सही नहीं है मगर हम भारतीय, अथिति देवो भवः से प्रभावित, कहीं भी झुक लेते हैं.
झुकने से याद आया कि हम तो उस परंपरा से आते हैं कि जो भी पांच साल में एक बार हमारे सामने दंडवत हो लेता है, हम उसी के हो जाते हैं. जो कायदे से हमारा सेवक है. जो हमें रिप्रेजेन्ट कर रहा है ..हम उसी को पाँच साल तक फर्शी सलाम बजाते हैं. वो हमारे बीच ऐसे जेड सिक्यूरीटी लेकर आता है कि मानो हम आतंकवादी हों और उसके लिए सबसे बड़ा खतरा हम ही हैं जिन्हें वो रिप्रेजेन्ट कर रहा है..और हम खुशी खुशी इस बंदोबस्त को मंजूरी देते हैं. लानत है ऐसी व्यवस्था पर....मगर है तो है.
अतः विदेशी नाम आते ही हल्की सी कमर झुक ही जाती है..खैर जाने दें इसे और पेड विदेशी मेहमानों को.. जिन्हें व्यवसाय हेतु निमंत्रित किया गया है. उनका प्राफिट लॉस वे जाने, हम उनको इस आलेख से बाहर रखते हैं.
अब बचे वे जो विदेश से निमंत्रण पर आते हैं. विदेश से निमंत्रण पर आने वाले मेहमान दो प्रकार के होते हैं एक वो जो रिश्तेदारी निभाने और मिलने मिलाने, शादी ब्याह आदि में आते हैं...और दूसरे वो जो राजनितिक कारणों से आते और बुलाये जाते हैं.
वो जो रिश्तेदारी निभाने और मिलने मिलाने, शादी ब्याह आदि में आते हैं...उनकी तो बात ही न करो. उन्हें देख कर लगता ही नहीं कि कभी ये भी इसी देश में रहते थे. जैसे ही आयेंगे..वेस्टर्न स्टाईल टायलेट खोजते हुए तुरंत नाक पर रुमाल और हाथ में पानी की बोतल लेकर.. लब से गुनगुनाते रहेंगे लगातार .. डिस्गस्टिंग...सो डिस्गस्टिंग...खायेंगे भी सब और लगातार कहते चलेंगे..सो अनहेल्दी...मानो हमारा नेता कह रहा हो..कितना भ्रष्टाचार है? हद हो रखी है..कोई भी घूस लेते दिखे..उसकी तस्वीर उतारो और हमें भेज दो तुरंत और आप सोचोगे कि वो उसे निलंबित करेंगे..और..वो तस्वीर खिंचवा रहे हैं ये पता करने के लिए..कि उसने इन्हें हिस्सा दिया कि नहीं? और अगर न दिया हो तो तस्वीर दिखा कर वसूला जाये.. ऐसे में इस तरह के रिश्तेदारों की क्या बात करना..इन्हें जाने देते हैं...
अब बचे वे.. जो राजनितिक कारणों से आते और बुलाये जाते हैं..ऐसे मेहमान दो प्रकार के होते हैं- एक वो जो अपने फायदे के लिए आते हैं और दूसरे वो, जिन्हें आप अपने फायदे के लिए बुलाते हैं.
एक वो जो अपने फायदे के लिए आते हैं..उनमें वो पुराने मित्र भी हो सकते हैं जिन्हें कभी हमने अपने फायदे के लिए बुलाया था...तमाम सत्कार किया था...उनके लिए नया सूट अपना नाम लिखवा कर सिलवा कर पहना था....मेरा दोस्त ...जैसा जुमला कहा था..आज वो ही मेहमान आकर मनमोहन सिंह की तारीफ कर के चला जाता है और उनके प्रिय मित्र उनसे मिलने भी न आते हैं जो कहते थे कि हम यूँ ही फोन उठा कर गप्प सटाका कर लेते हैं..हर हफ्ते...इतना अप साईड डाऊन,,,हद है ..ऐसे में तो इनकी बात क्या करना- इन्हें जाने देते हैं..
आज बात करते हैं जिन्हें आप विदेश से अपने फायदे के लिए बुलाते हैं....जैसे कभी मित्र को बुलाया  था अमरीका से.....और हाल ही में अमरीका की बिटिया को..
बिटिया का आना..फोटो ऑप...हैदराबादी दावत..आदि स्वागत में सब कुछ हुआ जो एक जबरदस्त मेहमान नवाजी में किया जा सकता है...यूँ तो स्वागत भी दो प्रकार के होते हैं..मगर...कितने और कब तक दो दो प्रकार निकालें? कहीं तो रुकना पड़ेगा वरना बात बढ़्ते बढ़ते आदमियों पर चली जायेगी जिसमें तो एक ही आदमी के कितने प्रकार होते हैं...निदा फाजली साहब भी फरमाते हैं कि
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
मगर हर हाल में फिर भी मेहमान तो मेहमान ही है..सत्कार तो होना ही चाहिये.
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के दिसम्बर १०, २०१७ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/24388840

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